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| अज्ञेय द्वारा रचित प्रसिद्ध यात्रा-वृत्तांत 'अरे यायावर रहेगा याद'। |
अरे यायावर रहेगा याद: अज्ञेय जी का यात्रा वृतांत। यूजीसी नेट हिंदी।
UGC NET/JRF हिन्दी साहित्य परीक्षा के नवीन पाठ्यक्रम की इकाई-10 (अन्य गद्य विधाएँ) में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' कृत यात्रा-वृत्तांत 'अरे यायावर रहेगा याद' (1953) एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण रचना है। NTA द्वारा आयोजित परीक्षाओं में अब केवल स्थूल प्रश्न न पूछकर अध्यायों के आंतरिक संवादों, पात्रों, ऐतिहासिक संदर्भों, कालक्रम और कथन-कारण पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं।
यह विशेष ब्लॉग पोस्ट परीक्षा की इसी गहन मांग को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसमें अज्ञेय जी के संपूर्ण जीवन-वृत्त, उनकी काव्य व गद्य कृतियों के कालक्रम, यात्रा-साहित्य के दार्शनिक आधार तथा 'अरे यायावर रहेगा याद' के आठों अध्यायों का विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। पोस्ट के अंत में परीक्षा की तैयारी के लिए 10 महत्त्वपूर्ण अभ्यास प्रश्न व्याख्या सहित शामिल किए गए हैं।
1. साहित्यकार परिचय: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
1.1 व्यक्तिगत जीवन-वृत्त एवं बहुभाषी व्यक्तित्व
पूरा नाम: सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'।
जन्म: 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर (तत्कालीन कसया) जिले में एक पुरातात्विक खुदाई शिविर में हुआ था।
निधन: 4 अप्रैल 1987 (नई दिल्ली)।
माता-पिता: पिता पं. हीरानंद शास्त्री एक सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता और विद्वान थे तथा माता व्यंती देवी थीं।
शिक्षा व भाषाई पृष्ठभूमि: अज्ञेय जी के पिता की सरकारी पुरातात्विक नौकरियों के कारण उनका बाल्यकाल लखनऊ, श्रीनगर, जम्मू, पटना, नालंदा और उटकमंड जैसी विभिन्न जगहों पर बीता। इस सतत स्थानांतरण ने उनके भीतर यायावरी संस्कारों का बीजारोपण किया। उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से इंटरमीडिएट तथा लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज से B.Sc. की डिग्री प्राप्त की। एम.ए. (अंग्रेजी) के अध्ययन के दौरान वे क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गए। उन्हें हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, फारसी, बांग्ला और असमी भाषा का गहरा ज्ञान था।
क्रांतिकारी आंदोलन एवं कारावास: हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़कर उन्होंने क्रांतिकारियों के लिए बम बनाने तथा चंद्र शेखर आजाद व भगत सिंह जैसे नायकों के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। 1930 में वे गिरफ्तार हुए और 1936 तक विभिन्न जेलों में नजरबंद व कारावास में रहे।
सैन्य सेवा व अध्यापन: द्वितीय विश्वयुद्ध के समय (1943-1946) ब्रिटिश भारतीय सेना में कैप्टन के रूप में कार्य किया। बाद में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले), हेडलबर्ग विश्वविद्यालय (जर्मनी) और जोधपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापन किया। 1980 में साहित्य व संस्कृति के संवर्धन के लिए 'वत्सलनिधि' न्यास की स्थापना की।
1.2 संपादकीय कार्य व साहित्यिक आंदोलन
पत्रकारिता: 'सैनिक' (आगरा), 'विशाल भारत' (कोलकाता), 'प्रतीक' (इलाहाबाद), 'दिनमान' (साप्ताहिक - संस्थापक संपादक), 'नवभारत टाइम्स', 'वाक्' (अंग्रेजी) तथा 'एवरीमैंस' का कुशल संपादन किया।
सप्तक परंपरा का प्रवर्तन: हिंदी कविता में 'प्रयोगवाद' और 'नई कविता' आंदोलन की नीव रखते हुए चार प्रमुख सप्तकों का संपादन किया:
तार सप्तक (1943)
दूसरा सप्तक (1951)
तीसरा सप्तक (1959)
चौथा सप्तक (1979)
1.3 प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964): काव्य-संग्रह 'आँगन के पार द्वार' के लिए।
भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार (1978): प्रसिद्ध काव्य-कृति 'कितनी नावों में कितनी बार' के लिए।
अंतरराष्ट्रीय सम्मान: अंतर्राष्ट्रीय 'गोल्डन रीथ' पुरस्कार (1983, स्ट्रुगा पोएट्री इवनिंग्स, मैसिडोनिया)।
2. अज्ञेय जी की संपूर्ण विधावार रचनावली
2.1 काव्य-संग्रह (प्रकाशन वर्ष सहित)
हिंदी कविता में आधुनिक संवेदना के संवाहक के रूप में अज्ञेय जी के काव्य-संग्रहों का कालक्रम परीक्षा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है:
काव्य-संग्रह का नाम-भग्नदूत
प्रकाशन वर्ष-1933 ई.
विशेष टिप्पणी -प्रथम काव्य-संग्रह
चिंता-1942 ई.-तीन खंड (विश्वप्रिया, चिंता, हारीति)
इत्यलम् -1946 ई.-युद्ध और प्रेम की संवेदना
हरी घास पर क्षण-भर-1949 ई.-प्रयोगवादी संवेदना का विकास
बावरा अहेरी -1954 ई.-सूर्य का प्रतीक ('बावरा अहेरी')
इंद्रधनुष रौंदे हुए ये-1957 ई.-आत्मपरकता और प्रकृति सम्मोहन
अरी ओ करुणा प्रभामय -1959 ई.-लिरिकल संवेदना
आँगन के पार द्वार-1961 ई.-साहित्य अकादमी पुरस्कार (1964), 'असाध्य वीणा' संकलित
पूर्वा-1965 ई.-प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह
सुनहले शैवाल-1965 ई.-प्रकृति-सौंदर्य की कविताएँ
कितनी नावों में कितनी बार-1967 ई.-ज्ञानपीठ पुरस्कार (1978)
क्योंकि मैं उसे जानता हूँ -1970 ई.-अस्तित्ववादी बोध
सागर-मुद्रा-1970 ई.-मिथकीय व समुद्री बिंब
पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ--1974 ई.--मौन और सन्नाटे का काव्य
महावृक्ष के नीचे--1977 ई.-आध्यात्मिक चिंतन
नदी की बाँक पर छाया--1981 ई.--उत्तर-काव्य संवेदना
सदानीरा-1986 ई.-दो खंडों में संपूर्ण काव्य-संग्रह
2.2 कथा-साहित्य एवं नाटक
उपन्यास:
शेखर: एक जीवनी (भाग-1: 1941, भाग-2: 1944) — मनोविश्लेषणात्मक व बाल्य-वयस्क विकास का उपन्यास।
नदी के द्वीप (1951) — व्यक्ति स्वातंत्र्य और समाज का अंतरसंबंध।
अपने-अपने अजनबी (1961) — मृत्यु-बोध और अस्तित्ववादी दर्शन पर आधारित।
कहानी-संग्रह: विपथगा (1937), परंपरा (1944), कोठरी की बात (1945), शरणार्थी (1948), जयदोल (1951), अमरवल्लरी (1954), ये तेरे प्रतिरूप (1961), छोड़रा हुआ रास्ता (1975)।
काव्य-नाटक: उत्तर प्रियदर्शी (1967) — सम्राट अशोक के जीवन एवं हिंसा से अहिंसा की ओर रूपांतरण पर आधारित।
2.3 निबंध, यात्रा-साहित्य एवं संस्मरण
यात्रा-वृत्तांत:
अरे यायावर रहेगा याद (1953) — स्वदेशी/भारतीय यात्राओं का वृत्तांत।
एक बूँद सहसा उछली (1960) — यूरोपीय/विदेश यात्राओं का वृत्तांत।
निबंध व आलोचना: त्रिशंकु (1945), सब रंग और कुछ राग (1956), आत्मनेपद (1960), भवंती (1971), अद्यतन (1971), लिखी कागद कोरे (1972), संवत्सर, केंद्र और परिधि।
डायरी व संस्मरण: भवंती, अंतरा, शाश्वती, स्मृति-लेखा, स्मृति के गलियारों से।
3. 'अरे यायावर रहेगा याद' (1953): गहन विश्लेषणात्मक अध्ययन
3.1 मूल पृष्ठभूमि एवं यायावरी दर्शन
'अरे यायावर रहेगा याद' का प्रथम प्रकाशन 1953 ई. में राजकमल प्रकाशन द्वारा हुआ था। इसमें द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर भारत की स्वाधीनता प्राप्ति तक के कालखंड में भारत के विविध क्षेत्रों (असम, बंगाल, पंजाब, कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु) की गई साहसिक यात्राओं का सजीव विवरण संकलित है।
अज्ञेय जी का मानना है कि यात्रा केवल भूगोल देखने या पर्यटन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक चेतना और आंतरिक आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है। वे लिखते हैं कि जो व्यक्ति ठहर जाता है, वह शिला हो जाता है; जीवन का मूल मंत्र तो 'गति, गति, गति' ही है। अज्ञेय स्वयं को न तो नगर का मानते हैं और न ही ग्राम का, वे अपने को 'अटवी' (जंगल/विमुक्त विहंग) का मानते हैं।
3.2 पुस्तक के 8 अध्यायों का क्रमिक एवं सूक्ष्म विवेचन
1. परशुराम से तूरख़म (एक टायर की राम-कहानी)
विशिष्ट शैली: यह पूरा वृत्तांत सैनिक गाड़ी के एक 'टायर' के दृष्टिकोण से प्रतीकात्मक रूप में लिखा गया है।
यात्रा मार्ग: पूर्व-असम (तिनसुकिया, सेखुआ घाट, परशुराम कुंड) से आरंभ होकर तेजपुर, सिलिगुड़ी, वर्द्धमान, आसनसोल, देहरी-आन-सोन, बनारस, इलाहाबाद, कानपुर, आगरा, मथुरा, दिल्ली, सोनीपत, अमृतसर, लाहौर, तक्षशिला, हसन अब्दाल, अटक, पेशावर से होते हुए अफगानिस्तान सीमा पर स्थित तूरखम तक जाता है।
महत्वपूर्ण संदर्भ व उद्धरण:
आगरा में सेना के शिविर का नाम पहले 'चौमीला बाग', फिर 'द लिमिट' और अंततः 'अमलतासी' रखा गया।
आगरा में ताजगंज स्थित मियाँ नज़ीर अकबराबादी की मज़ार पर कविता याद करते हैं: "ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन..."।
तक्षशिला और गंधार सभ्यता के अवशेषों को देखते हुए पुरातत्व पर विचार व्यक्त करते हैं कि यायावर के लिए इतिहास केवल निर्जीव खंडहर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्राण-धारा है।
अफगानिस्तान सीमा के तूरखम पर अंग्रेजी बोर्ड लगा था: "Frontier of India: Travelers are not permitted to pass this notice-board..."
2. किरणों की खोज में
पृष्ठभूमि: यह यात्रा अज्ञेय जी ने भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी और कॉस्मिक किरणों (Cosmic Rays) के वैज्ञानिक अनुसंधानात्मक दल के सदस्य के रूप में की थी।
यात्रा क्षेत्र: श्रीनगर से पामपुर, शोपियाँ, अहरबल जलप्रपात से होते हुए पीर पंजाल श्रेणी में स्थित कौसरनाग झील तक।
मुख्य पात्र व प्रसंग:
दल में प्रोफ़ेसर (गुरुजी), बड़ा जोशी, छोटा जोशी, रहमत (घोड़े वाला) तथा कुंदनसिंह शामिल थे।
खेत से भुट्टे तोड़कर खाने पर अज्ञेय का परिहास: "इसे ही तो कहते हैं गुनाह बेलज्ज़त!"।
कौसरनाग में एक गुज्जर द्वारा भैंस का दूध गाय का बताकर बेचने पर उसका छल-संवाद: "हजूर सो तो आपको खुश करने को कहा; हम समझा आप गाय का दूध नहीं पीते हैं!"।
श्रीनगर लौटने पर बाढ़ में मूल नेगेटिव भीगने पर गुरुजी का व्यंग्य: "हाँ, और उसे चरम गौरव देने के लिए हम सबको बाढ़ में डूब जाना चाहिए था।"
3. देवताओं के अंचल में
स्थान: कुल्लू एवं मनाली (हिमाचल प्रदेश)।
विशेष तथ्य: अज्ञेय ने यह यात्रा 1935 से 1940 के कालखंड में की थी। कुल्लू को अनेक पौराणिक मंदिरों की उपस्थिति के कारण 'देवताओं का अंचल' कहा गया है।
संस्मरण: मनाली में एक लकड़ी के मचाननुमा मकान में रहकर अज्ञेय ने जेल जीवन में अंग्रेजी में लिखी रचना को हिंदी में रूपांतरित कर अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'शेखर: एक जीवनी' की पृष्ठभूमि तैयार की थी।
4. मौत की घाटी में
स्थान: मनाली से रोहतांग दर्रा / रोहतांग जोत की अत्यंत कठिन और प्राणलेवा यात्रा। 'रोहतांग' शब्द का शाब्दिक अर्थ ही 'मौत की घाटी' होता है।
मुख्य घटनाएँ: राहला प्रपात, वशिष्ठ कुंड, हिडिम्बा मंदिर का दर्शन। गाँव में शाम के समय मकान पर पत्थरों की रहस्यमयी बौछार होने का उल्लेख, जिसे बाद में गाँव के मुखिया से मिलकर सुलझाया गया।
5. एलुरा
स्थान: महाराष्ट्र में स्थित औरंगाबाद, दौलताबाद तथा एलुरा (एलोरा) की ऐतिहासिक गुफाएँ।
सांस्कृतिक चेतना: एलुरा की गुफाओं को तीन प्रमुख धार्मिक श्रेणियों (बौद्ध, ब्राह्मण/हिंदू, जैन) में विभाजित किया गया है। पास में अहल्याबाई का मंदिर और सरोवर है। अज्ञेय यहाँ मुगल शासक औरंगजेब की सौंदर्य-विरोधी दृष्टि और ऐतिहासिक विषमता पर करारा सांस्कृतिक व्यंग्य करते हैं।
6. माझुली
स्थान: असम में ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी-द्वीप माझुली (मजुली)।
सांस्कृतिक संदर्भ: असमिया वैष्णव धर्म, श्रीमंत शंकरदेव और माधवदेव द्वारा प्रवर्तित 'सत्र' परंपरा का सूक्ष्म विवरण।
संवाद: औनियाटी सत्र के गोसाईं जी (सत्राधिकार) द्वारा अज्ञेय से असमी, बांग्ला, ब्रजबुली तथा माधवदेव के 'बड़-गीत' (बोरगीत) पर विचार-विमर्श।
7. बहता पानी निर्मला
विषय: असम के शिवसागर, सोनारी व दिब्रूगढ़ में वर्षा ऋतु में आई भीषण बाढ़ और प्राकृतिक विभीषिका का साहसिक अनुभव।
यायावरी का कालजयी उद्धरण:
अज्ञेय लिखते हैं: "यों तो वास्तविक जीवन में भी काफ़ी घूमा-भटका हूँ, पर उस से कभी तृप्ति नहीं हुई, हमेशा मन में यही रहा कि कहीं और चलें, कोई नयी जगह देखें और इस लालसा ने अभी भी पीछा नहीं छोड़ा है।"
यायावरी दर्शन पर प्रसिद्ध कथन: "रमता राम इसीलिए कहते हैं कि जो रमता नहीं, वह राम नहीं। टिकना तो मौत है!"
8. सागर-सोवित, मेघ-मेखलित (कन्याकुमारी से नन्दादेवी)
विस्तार: दक्षिण भारत (कन्याकुमारी, मद्रास, मदुरै का मीनाक्षी मंदिर, तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, चिदंबरम, कांचीपुरम, महाबलीपुरम) से लेकर उत्तर भारत के कूर्मांचल/हिमालय (नंदादेवी, कौसानी, अल्मोड़ा) तक की सांस्कृतिक यात्रा।
सांस्कृतिक आह्वान: पाश्चात्य नारे 'Go West, Young Man' के प्रतिउत्तर में अज्ञेय भारतीय चेतना के संवर्धन के लिए 'Go South, Young Man' (दक्षिणपाथ पकड़ो) का आह्वान करते हैं।
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4. UGC NET MCQ
प्रश्न 1 [अध्यायों का क्रमिक विभाजन]
'अरे यायावर रहेगा याद' में संकलित अध्यायों का सही क्रम क्या है? (A) किरणों की खोज में
(B) परशुराम से तूरख़म
(C) मौत की घाटी में
(D) माझुली
(E) एलुरा
सही विकल्प का चयन कीजिए:
(A), (B), (C), (E), (D)
(B), (A), (C), (E), (D)
(B), (C), (A), (D), (E)
(A), (C), (B), (E), (D)
उत्तर: 2. (B), (A), (C), (E), (D)
व्याख्या: 'अरे यायावर रहेगा याद' में कुल 8 अध्याय हैं। इनका सही क्रमानुसार विन्यास है: 1. परशुराम से तूरख़म, 2. किरणों की खोज में, 3. देवताओं के अंचल में, 4. मौत की घाटी में, 5. एलुरा, 6. माझुली, 7. बहता पानी निर्मला, 8. सागर-सोवित, मेघ-मेखलित।
प्रश्न 2 [कथन और कारण (Assertion - Reason)]
कथन (A): अज्ञेय के अनुसार यात्रा केवल मनोरंजक देशाटन या दृश्य-परिवर्तन न होकर सांस्कृतिक-दृष्टि के विकास का सशक्त माध्यम है।
कारण (R): 'अरे यायावर रहेगा याद' में लेखक केवल पुरातात्विक खंडहरों का स्थूल विवरण प्रस्तुत करता है, उसका मानवी मूल्य और कार्य-कारण संबंध से कोई सरोकार नहीं है।
सही विकल्प चुनिए:
(A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की सही व्याख्या है।
(A) और (R) दोनों सही हैं परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(A) सही है परंतु (R) गलत है।
(A) गलत है परंतु (R) सही है।
उत्तर: 3. (A) सही है परंतु (R) गलत है।
व्याख्या: अज्ञेय जी स्पष्ट मानते हैं कि यायावर के लिए ऐतिहासिक स्थल और खंडहर निर्जीव वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि वे जीवन की निरंतर प्रवाहमान संस्कृति के प्रतीक हैं। इसलिए कथन (A) सत्य है, किंतु कारण (R) असत्य है।
प्रश्न 3 [सुमेलन सूची (Matching Type)]
सूची-I (अध्याय का नाम) को सूची-II (संबद्ध स्थान/मुख्य विषय) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I (अध्याय)
सूची-II (स्थान/मुख्य विषय)
(A) परशुराम से तूरख़म
(I) कॉस्मिक किरणों का वैज्ञानिक अध्ययन एवं कौसरनाग झील
(B) किरणों की खोज में
(II) एक सैनिक गाड़ी के 'टायर' के दृष्टिकोण से यात्रा
(C) देवताओं के अंचल में
(III) असमिया वैष्णव सत्र एवं श्रीमंत शंकरदेव परंपरा
(D) माझुली
(IV) कुल्लू-मनाली की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि
सही कूट:
(A)-(II), (B)-(I), (C)-(IV), (D)-(III)
(A)-(I), (B)-(II), (C)-(III), (D)-(IV)
(A)-(II), (B)-(IV), (C)-(I), (D)-(III)
(A)-(III), (B)-(I), (C)-(IV), (D)-(II)
उत्तर: 1. (A)-(II), (B)-(I), (C)-(IV), (D)-(III)
व्याख्या: 'परशुराम से तूरख़म' में गाड़ी के टायर का प्रतीक प्रयुक्त है; 'किरणों की खोज में' कॉस्मिक किरणों के अध्ययन की कौसरनाग यात्रा है; 'देवताओं के अंचल में' कुल्लू-मनाली का वर्णन है तथा 'माझुली' अध्याय असमिया सत्र परंपरा से संबंधित है।
प्रश्न 4 [कालक्रमानुसार विन्यास]
अज्ञेय जी के निम्नलिखित काव्य-संग्रहों को उनके प्रकाशन वर्ष के सही कालक्रमानुसार व्यवस्थित कीजिए:
(A) अरी ओ करुणा प्रभामय
(B) भग्नदूत
(C) हरी घास पर क्षण-भर
(D) आँगन के पार द्वार
(E) कितनी नावों में कितनी बार
सही कूट:
(B), (C), (A), (D), (E)
(B), (A), (C), (E), (D)
(C), (B), (A), (D), (E)
(B), (C), (D), (A), (E)
उत्तर: 1. (B), (C), (A), (D), (E)
व्याख्या: सही कालक्रम है— भग्नदूत (1933 ई.) → हरी घास पर क्षण-भर (1949 ई.) → अरी ओ करुणा प्रभामय (1959 ई.) → आँगन के पार द्वार (1961 ई.) → कितनी नावों में कितनी बार (1967 ई.)।
प्रश्न 5 [कथन I और कथन II]
कथन I: अज्ञेय जी को 1964 ई. में काव्य-संग्रह 'कितनी नावों में कितनी बार' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
कथन II: अज्ञेय जी को 1978 ई. में 'आँगन के पार द्वार' काव्य-कृति पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सही विकल्प का चयन कीजिए:
कथन I और कथन II दोनों सही हैं।
कथन I और कथन II दोनों गलत हैं।
कथन I सही है, परंतु कथन II गलत है।
कथन I गलत है, परंतु कथन II सही है।
उत्तर: 2. कथन I और कथन II दोनों गलत हैं।
व्याख्या: दोनों कथनों के पुरस्कार परस्पर परिवर्तित हैं। अज्ञेय जी को 'आँगन के पार द्वार' पर साहित्य अकादमी (1964) तथा 'कितनी नावों में कितनी बार' पर ज्ञानपीठ पुरस्कार (1978) प्राप्त हुआ था।
प्रश्न 6 [बहुविकल्पीय चयन]
'अरे यायावर रहेगा याद' यात्रा-वृत्तांत के संदर्भ में कौन-से कथन सत्य हैं? (A) इसका प्रथम प्रकाशन 1953 ई. में हुआ था।
(B) 'एक बूँद सहसा उछली' में अज्ञेय जी की यूरोपीय यात्राओं का चित्रण है।
(C) इसमें कुल 10 अध्याय संकलित हैं।
(D) लेखक ने स्वयं को 'ग्राम' या 'नगर' का न मानकर 'अटवी' का माना है।
सही कूट का चयन कीजिए:
केवल (A), (B) और (C)
केवल (A), (B) और (D)
केवल (B), (C) और (D)
केवल (A) और (D)
उत्तर: 2. केवल (A), (B) और (D)
व्याख्या: कथन (C) असत्य है क्योंकि 'अरे यायावर रहेगा याद' में 10 नहीं बल्कि कुल 8 अध्याय हैं। शेष सभी कथन सत्य हैं।
प्रश्न 7 [पात्र एवं संवाद सुमेलन]
सूची-I (पात्र/संवादकर्ता) को सूची-II (संबद्ध कथन/संवाद) से सुमेलित कीजिए:
सूची-I (पात्र)
सूची-II (संवाद / कथन)
(A) गुरुजी (प्रोफ़ेसर)
(I) "हजूर सो तो आपको खुश करने को कहा; हम समझा आप गाय का दूध नहीं पीते हैं!"
(B) कौसरनाग का गुज्जर
(II) "हाँ, और उसे चरम गौरव देने के लिए हम सबको बाढ़ में डूब जाना चाहिए था।"
(C) अज्ञेय (यायावर)
(III) "माधवदेव के बड़-गीत आपने पढ़े हैं?"
(D) सत्राधिकार (गोसाईं जी)
(IV) "इसे ही तो कहते हैं गुनाह बेलज्ज़त!"
सही कूट:
(A)-(II), (B)-(I), (C)-(IV), (D)-(III)
(A)-(I), (B)-(II), (C)-(III), (D)-(IV)
(A)-(IV), (B)-(I), (C)-(II), (D)-(III)
(A)-(II), (B)-(III), (C)-(IV), (D)-(I)
उत्तर: 1. (A)-(II), (B)-(I), (C)-(IV), (D)-(III)
व्याख्या: श्रीनगर बाढ़ में चित्रों के नेगेटिव खराब होने पर गुरुजी व्यंग्य करते हैं; गुज्जर दूध पर अपनी सफाई देता है; खेत से भुट्टे तोड़ने पर अज्ञेय 'गुनाह बेलज्ज़त' कहते हैं; और सत्राधिकार माधवदेव के बड़-गीत पर चर्चा करते हैं।
प्रश्न 8 [कथन I और कथन II]
कथन I: 'बहता पानी निर्मला' अध्याय में अज्ञेय जी ने वर्षा ऋतु में असम की भीषण बाढ़ के दौरान की गई यात्रा का वर्णन किया है।
कथन II: अज्ञेय जी ने भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण के लिए 'Go West, Young Man' का नारा दिया था।
सही विकल्प का चयन कीजिए:
कथन I और कथन II दोनों सही हैं।
कथन I और कथन II दोनों गलत हैं।
कथन I सही है, परंतु कथन II गलत है।
कथन I गलत है, परंतु कथन II सही है।
उत्तर: 3. कथन I सही है, परंतु कथन II गलत है।
व्याख्या: कथन II असत्य है क्योंकि अज्ञेय ने अमेरिकी नारे के जवाब में दक्षिण भारत के प्राचीन सांस्कृतिक केंद्रों की यात्रा हेतु 'Go South, Young Man' (दक्षिणपाथ पकड़ो) का आह्वान किया था।
प्रश्न 9 [सप्तक परंपरा से संबंधित बहुविकल्पीय प्रश्न]
अज्ञेय द्वारा संपादित 'सप्तक' परंपरा के संदर्भ में सही कथनों का चयन कीजिए:
(A) 'तार सप्तक' का प्रकाशन 1943 ई. में हुआ।
(B) 'दूसरा सप्तक' का संपादन 1951 ई. में हुआ।
(C) 'तीसरा सप्तक' का प्रकाशन 1959 ई. में हुआ।
(D) अज्ञेय ने केवल दो ही सप्तकों का संपादन किया था।
सही कूट:
केवल (A) और (B)
केवल (A), (B) और (C)
केवल (B), (C) और (D)
उपर्युक्त सभी
उत्तर: 2. केवल (A), (B) और (C)
व्याख्या: अज्ञेय जी ने चार सप्तकों (तार सप्तक - 1943, दूसरा सप्तक - 1951, तीसरा सप्तक - 1959 तथा चौथा सप्तक - 1979) का संपादन किया था। अतः कथन (D) असत्य है।
प्रश्न 10 [उद्धरण व पहचान]
"रमता राम इसीलिए कहते हैं कि जो रमता नहीं, वह राम नहीं। टिकना तो मौत है!" — यह प्रसिद्ध पंक्ति अज्ञेय के किस यात्रा-वृत्तांत/अध्याय से ली गई है?
1.परशुराम से तूरख़म
2.किरणों की खोज में
3.बहता पानी निर्मला।
4.सागर-सोवित, मेघ-मेखलित
उत्तर: 3. बहता पानी निर्मला
व्याख्या: यह बहुचर्चित पंक्ति अज्ञेय जी के यात्रा-वृत्तांत 'बहता पानी निर्मला' में उद्धृत है, जहाँ वे यायावरी दर्शन और गतिशीलता को जीवन का मूल लक्षण स्वीकार करते हैं।
निष्कर्ष
अज्ञेय का यात्रा-वृत्तांत 'अरे यायावर रहेगा याद' हिंदी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण रचना है। इसमें लेखक ने अपनी यात्राओं के अनुभवों, प्रकृति के सौंदर्य, जीवन-दृष्टि और मानवीय संवेदनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। यह रचना पाठकों को यात्रा के माध्यम से जीवन और संसार को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देती है। UGC NET हिंदी की दृष्टि से भी यह एक महत्त्वपूर्ण रचना है।
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हमारा उद्देश्य है—ज्ञान को सरल बनाना और शिक्षा को हर विद्यार्थी तक पहुँचाना।
🙏 उम्मीद है कि यह लेख आपकी परीक्षा की तैयारी में उपयोगी सिद्ध होगा।

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