UGC NET हिंदी इकाई 10: आवारा मसीहा | विष्णु प्रभाकर के नोट्स एवं MCQ

 

UGC NET हिंदी इकाई 10 आवारा मसीहा जीवनी और लेखक विष्णु प्रभाकर के महत्वपूर्ण नोट्स
UGC NET हिंदी इकाई 10: विष्णु प्रभाकर की प्रसिद्ध जीवनी ‘आवारा मसीहा’ के महत्वपूर्ण नोट्स।

आवारा मसीहा: (इकाई-10: अन्य गद्य 

विधाएँ - जीवनी) का संपूर्ण, प्रामाणिक और विस्तृत नोट्स।


1. ग्रंथ-परिचय एवं आधारभूत तथ्य

'आवारा मसीहा' आधुनिक हिंदी साहित्य में जीवनी-लेखन विधा की

 एक युगांतरकारी रचना है। यह बंगला के विश्वविख्यात कथाशिल्पी 

और उपन्यास सम्राट शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के संघर्षमय जीवन,

 उनके अंतर्मुखी व्यक्तित्व तथा कालजयी साहित्यिक अवदान पर 

आधारित एक सर्वथा प्रामाणिक और औपन्यासिक जीवनी है।


आधारभूत बिंदु तालिका

कृति का नाम -आवारा मसीहा (औपन्यासिक जीवनी)

जीवनीकार (लेखक) -विष्णु प्रभाकर (जन्म: 1912 ई., मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश)

चरितनायक (नायक)-शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय (महान बंगला उपन्यासकार)

प्रकाशन वर्ष -मार्च 1974 ई.

प्रकाशक -राजपाल एंड संस, नई दिल्ली

सृजन/शोध अवधि–14 वर्ष (सन 1959 से 1973 ई. तक)

कुल भाग/संरचना–3 पर्व (दिशाहारा, दिशा की खोज, दिशांत)

कुल पृष्ठ संख्या–लगभग 413 पृष्ठ (भूमिका लगभग 30 पृष्ठों की)

मुख्य प्रेरणा स्रोत–श्री नाथूराम प्रेमी (अध्यक्ष, हिंदी ग्रंथ रत्नाकर, बंबई) एवं यशपाल जी की चर्चा

प्राप्त प्रमुख सम्मान–सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, पाब्लो नेरुदा सम्मान


2. रचना-प्रक्रिया और 14 वर्षों की शोध-साधना

विष्णु प्रभाकर जी मूलतः कथाकार थे, किंतु 'आवारा मसीहा' के सृजन ने उनके साहित्यिक परिचय को सदा-सदा के लिए बदल दिया। इस प्रामाणिक जीवनी को रचने का मार्ग अत्यंत कठिन था, क्योंकि शरतचन्द्र का जीवन-क्रम अत्यंत उलझा हुआ, विश्रंखलित और किंवदंतियों से ढका हुआ था। शरत बाबू अपनी आत्म-कथा लिखने या जीवन-प्रसंगों को उजागर करने के विरोधी थे।जब स्वयं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने शरत से कहा था कि "शरत् अपनी आत्मकथा लिखो", तो शरत का उत्तर था कि "गुरुदेव यदि मैं जानता कि मैं बड़ा आदमी बनूँगा तो मैं किसी और प्रकार का जीवन जीता।"

शोध-यात्रा की प्रमुख चुनौतियाँ एवं स्रोत

14 वर्षों की साधना (1959-1973 ई.): विष्णु जी ने

 1959 में सामग्री जुटाना प्रारंभ किया और 1973 में 

लेखन पूर्ण किया। एक 'मसिजीवी' (केवल लेखन पर

 निर्भर) लेखक के लिए इतने लंबे समय तक एक ही

 प्रोजेक्ट पर केंद्रित रहना अभूतपूर्व त्याग था।

स्थानों की व्यापक यात्राएँ: शरत के बिखरे जीवन-सूत्रों को खोजने के लिए जीवनीकार ने बिहार (भागलपुर), बंगाल (देवानंदपुर, कलकत्ता,सामताबेड) तथा बर्मा (रंगून) की कठिन यात्राएँ कीं।

प्रामाणिकता हेतु शोध पद्धति: विष्णु जी ने काल्पनिक उड़ानों से बचते हुए शरत के मित्रों, संबंधियों और समकालीनों के साक्षात्कार तथा संस्मरणों पर भरोसा किया। तिथियों की प्रामाणिकता की जाँच के लिए उन्होंने पुराने स्कूल-कॉलेज के रजिस्टरों, विश्वविद्यालय के कैलेंडरों और यहां तक कि ज्योतिषियों का सहारा लिया।

उदाहरण स्वरूप: पूर्व जीवनीकारों ने शरत की मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण

 करने की तिथि 'दिसंबर 1894' मानी थी, किंतु विष्णु जी ने कलकत्ता विश्वविद्यालय का कैलेंडर खँगालकर यह सिद्ध किया कि परीक्षा सोमवार, 12 फरवरी 1894 को आरंभ हुई थी और परिणाम अप्रैल 1894 में आया था।

अन्य जीवनीकारों का कार्य: विष्णु जी से पूर्व बांग्ला में गोपाल चंद्र राय ने सामग्री जुटाने का सर्वाधिक प्रामाणिक कार्य किया था, तथा बनारस के विश्वनाथ मुखर्जी ने भी एक जीवनी लिखी थी। किंतु हिंदी में विष्णु प्रभाकर ने जो सांगोपांग प्रामाणिक जीवनी रची, उसकी मिसाल बांग्ला साहित्य में भी नहीं मिलती।


3. शीर्षक की सार्थकता: 'आवारा' और 'मसीहा' का द्वंद्व

'आवारा मसीहा' नाम को लेकर साहित्य जगत में व्यापक ऊहापोह और तर्क-वितर्क हुआ। आलोचकों को 'आवारा' और 'मसीहा' दो परस्पर विरोधी गुणधर्म वाले शब्द प्रतीत हुए। इस पर विष्णु प्रभाकर ने स्वयं शीर्षक का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा:

"आवारा और मसीहा दो शब्द हैं। दोनों में एक ही अंतर है—

आवारा के सामने दिशा नहीं होती। जिस दिन उसे दिशा मिल 

जाती है, उसी दिन वह मसीहा बन जाता है। मैं इस नाम के माध्यम से यही बताना चाहता था कि कैसे एक आवारा लड़का अंत में पीड़ित मानवता का मसीहा बन गया।" डॉ. प्रभाकर माचवे ने आधुनिक कलाकारों के संदर्भ में बर्नार्ड शा द्वारा प्रयुक्त शब्द 'ट्रैम्प प्रॉफेट' (आवारा-मसीहा) को शरतचन्द्र पर शत-प्रतिशत लागू माना और कहा कि जीवनीकार जीवनी से एकाकार हो गया है।


4. 'आवारा मसीहा' के तीनों पर्वों का विस्तृत विशलेषण

विष्णु प्रभाकर ने शरतचन्द्र के जीवन-क्रम को तीन सुसंगठित पर्वों में विभक्त किया है:

प्रथम पर्व: दिशाहारा (बचपन, भटकाव किशोरावस्था) - लगभग 75 पृष्ठ

द्वितीय पर्व: दिशा की खोज (रंगून प्रवास व साहित्य-सृजन)- 

लगभग 91 पृष्ठ

तृतीय पर्व: दिशांत (कलकत्ता वापसी, प्रसिद्धि व महाप्रयाण) - 

लगभग 271 पृष्ठ

(क) प्रथम पर्व: 'दिशाहारा'

विषय वस्तु: शरतचन्द्र के जन्म, ननिहाल के माहौल,

 बचपन की उच्छृंखलता, निरंतर भटकाव, माता-पिता 

के व्यक्तित्व तथा रंगून जाने तक की जीवन गाथा।

पारिवारिक पृष्ठभूमि:

देवानंदपुर (जन्मस्थान): शरत का जन्म हुगली जिले के देवानंदपुर में हुआ।

पिता मोतीलाल: अत्यधिक स्वप्नदर्शी, यायावर,शिल्पी मन वाले किंतु आर्थिक रूप से विफल व्यक्ति थे। उन्हें कविता, कहानी, नाटक लिखने और चित्रकारी का शौक था। शरत के भीतर साहित्य और सौंदर्य-बोध के संस्कार पिता से ही आए।

माता भुवनमोहिनी: अत्यंत सीधी, करुणामयी और सेवाभावी महिला थीं।

भागलपुर ननिहाल (गांगुली परिवार): नाना केदारनाथ 

Gangopadhyay और छोटे नाना अघोरनाथ का परिवार अत्यंत संपन्न किंतु कठोर अनुशासन वाला था। बड़े मामा ठाकुरदास गंगोपाध्याय गांगुली परिवार की कट्टरता के प्रतीक थे।

बचपन के प्रसंग एवं गतिविधियाँ:

शिक्षा एवं पाठशालाएँ: अक्षय पंडित की घर-पाठशाला से आरंभ, जहाँ यमराज जैसा अनुशासन था। बाद में सिद्धेश्वर भट्टाचार्य का बांग्ला स्कूल, देहरी ऑन सोन प्रवास, और फिर अंग्रेजी स्कूल में प्रवेश।

मंत्र एवं 'संसार कोश': नाना के घर की सख्तियों से बचने के लिए शरत ने पिता की एक पुस्तक 'संसार कोश' से एक रक्षा-मंत्र ढूँढा—

 "ओम ह्रां धूं धूं रक्षरक्ष स्वाहा"|

शौक व प्रवृत्तियाँ: तितली-उद्योग (विभिन्न तितलियों को पालना),

 गंगा में तैरना, नाव खेना, पतंगबाजी और 'जात्रादल' (लोक नाट्य मंडली) में शागिर्दी।

राजू से प्रतिद्वंद्विता: गांगुली परिवार के पड़ोस में रहने वाले मजूमदार परिवार के साहसी बालक राजेंद्रनाथ उर्फ राजू से पतंगबाजी की जंग में शरत के दल का मांझा विजयी हुआ।

प्रथम साहित्यिक प्रयास: गुरुभाई काशीनाथ को केंद्र बनाकर 'काशीनाथ' कहानी लिखी। इसके अतिरिक्त 'काकबासा' और 'कोरेल ग्राम' कहानियों की रूपरेखा बनी। 'कुंतलीन पुरस्कार' के लिए अपनी कहानी 'मंदिर' अपने मित्र सुरेंद्रनाथ गंगोपाध्याय के नाम से भेजी और उसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया।

पर्व का समापन: पारिवारिक विपन्नता, कठोरता और माँ के निधन के बाद हताश होकर शरत का रंगून (बर्मा) जाने का निर्णय।

(ख) द्वितीय पर्व: 'दिशा की खोज'

विषय वस्तु: शरत के बर्मा (रंगून) प्रवास की 13 वर्षों (1903-1916 ई.) की संघर्षपूर्ण कथा, नौकरी, वेश्याओं व शोषितों के प्रति करुणा, प्रथम व द्वितीय विवाह और कथाशिल्पी के रूप में उदय।

रंगून आगमन व परिस्थितियाँ:

रंगून पहुँचने पर प्लेग महामारी के कारण कड़े स्वास्थ्य परीक्षण (चेकिंग) का सामना करना पड़ा।रंगून में उन्होंने रेलवे लेखा विभाग (Accountant General's Office) में क्लर्क के पद पर सरकारी नौकरी की।

पारिवारिक एवं व्यक्तिगत जीवन:

प्रथम विवाह (शांति देवी): एक मिस्त्री की कन्या शांति देवी से विवाह हुआ। किंतु प्लेग के प्रकोप के कारण पत्नी और नवजात शिशु दोनों की दुखद मृत्यु हो गई।

द्वितीय विवाह (मोक्षदा / हिरण्मयी देवी): इसके बाद उन्होंने एक

 असहाय महिला से विवाह किया, जिन्हें बाद में 'हिरण्मयी देवी' नाम मिला। वे शरत की मृत्यु के बाद 22 वर्षों तक जीवित रहीं।

साहित्यिक उदय:

रंगून में ही शरत के भीतर छिपी रचनात्मक ऊर्जा विस्फोटक रूप से प्रकट हुई। यहाँ उन्होंने 'बड़ी दीदी', 'चरित्रहीन','नारी का इतिहास', 'तैलचित्र' आदि कृतियों की रूपरेखा व लेखन किया। जब 'बड़ी दीदी' उपन्यास कुंतलीन प्रेस की 'भारती' पत्रिका में बिना नाम के धारावाहिक छपा, तो लोगों ने समझा कि यह रवींद्रनाथ टैगोर की रचना है। बाद में शरतचन्द्र का नाम उजागर होने पर वे एकाएक संपूर्ण बंगाल में प्रसिद्ध हो गए।

(ग) तृतीय पर्व: 'दिशांत'

विषय वस्तु: रंगून से 1916 में कलकत्ता (शिवपुर, हावड़ा तथा बाद में सामताबेड़) स्थायी वापसी, अपार जनप्रियता,राजनीतिक सक्रियता, राष्ट्रीय आंदोलनों में भागीदारी, रवींद्रनाथ से वैचारिक संवाद/तनाव,'पाथेर दाबी' की जब्ती और महाप्रयाण।

कलकत्ता वापसी और सामाजिक प्रतिष्ठा:

जिस समय शरत रंगून गए थे, वे उपेक्षित और अकिंचन थे; किंतु 

जब 13 वर्ष बाद 1916 में लौटे तो एक स्थापित और ख्यातनामा 

कथाशिल्पी बनकर लौटे।

राजनीतिक गतिविधियाँ:

शरतचन्द्र केवल साहित्यकार नहीं थे, वे हावड़ा जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे।देशबंधु चितरंजन दास और नेताजी सुभाषचंद्र बोस से उनके अत्यंत प्रगाढ़ संबंध थे। असहयोग आंदोलन और क्रांतिकारी गतिविधियों का उन्होंने खुलकर समर्थन किया।

विवादास्पद उपन्यास 'पाथेर दाबी' (1926 ई.):

क्रांतिकारियों के जीवन पर आधारित इस क्रांतिकारी उपन्यास को ब्रिटिश सरकार ने राजद्रोहात्मक मानकर तुरंत जब्त (Ban) कर लिया था। जब शरत ने इस जब्ती के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर से वक्तव्य देने का अनुरोध किया, तो गुरुदेव ने मना करते हुए कहा कि पुस्तक में ब्रिटिश शासन के खिलाफ जो तीखापन है, उससे सरकार का क्रुद्ध होना स्वाभाविक है। इससे दोनों के बीच कुछ समय के लिए 

विच्छेद आ गया।

रवींद्रनाथ टैगोर से संबंध:

शरत मन ही मन रवींद्रनाथ को अपना सर्वोच्च गुरु मानते थे और उनकी 'प्रकृतिर प्रतिशोध' कविता पढ़कर भावुक हो उठते थे।

महाप्रयाण (1938 ई.):

16 जनवरी 1938 को कलकत्ता में साहित्य के इस अमर शिल्पी का 

निधन हो गया। जीवनी के अंत में उनकी अंतिम शवयात्रा का अत्यंत 

करुण चित्रण है।


5. जीवनी के प्रमुख पात्र एवं उनकी विशेषताएँ

'आवारा मसीहा' केवल शरतचन्द्र का चरित्र-चित्रण नहीं करती,बल्कि

 उनके समकालीन जीवन के दर्जनों सजीव पात्रों को प्रस्तुत करती है:

(क) पारिवारिक एवं व्यक्तिगत पात्र

मोतीलाल: शरत के पिता—स्वप्नदर्शी, यायावर, कला-प्रेमी किंतु अकर्मण्य।

भुवनमोहिनी: शरत की माता—सहनशील और करुणामयी।

केदारनाथ व अघोरनाथ: भागलपुर के नाना—

कड़े अनुशासनप्रिय।

मुशाई: नाना के घर का वफादार सेवक।

 (यही पात्र शरत के प्रसिद्ध उपन्यास 'देवदास' के 'धर्मदास' पात्र का वास्तविक आधार बना)।

राजू (राजेंद्रनाथ मजूमदार): बचपन का साहसी, निडर,

 अयाचित दोस्त। (यह पात्र 'श्रीकांत' के अमर पात्र 'इंद्रनाथ' तथा

 'देवदास' का आधार बना)।

शांति देवी: प्रथम पत्नी, जिनकी प्लेग से मृत्यु हुई।

हिरण्मयी देवी (मोक्षदा): द्वितीय पत्नी, जिन्होंने आजीवन शरत की

 सेवा की।

धीरू (निरुपमा देवी): बचपन की संगिनी, जो स्वयं बाद में प्रसिद्ध 

बांग्ला लेखिका बनीं।

नीरू दीदी व विलासी: शरत के वास्तविक जीवन की वे शोषित महिलाएँ, जिनकी करुण कथाओं ने उनके उपन्यासों में नारी-संवेदना को जन्म दिया।

(ख) साहित्यिक एवं राजनीतिक पात्र

रवींद्रनाथ टैगोर: शरत के प्रेरणा पुरुष एवं वैचारिक गुरु।

देशबंधु चितरंजन दास व सुभाषचंद्र बोस: राष्ट्रीय 

आंदोलन के साथी व राजनैतिक पथ-दर्शक।

महात्मा गांधी: जिनके आदेश पर 1925 में महादेव देसाई ने शरत की रचनाओं ('बिराज बहू', 'बिंदु की लाला', 'राम की सुमति', 'मझली दीदी') का गुजराती में अनुवाद किया था।


6. यथार्थ जीवन-प्रसंग और औपन्यासिक रचनाओं का संबंध

विष्णु प्रभाकर ने यह स्पष्ट किया है कि शरत के लगभग सभी उपन्यासों की जड़ें उनके अपने यथार्थ जीवन के अनुभवों में थीं:

यथार्थ जीवन प्रसंग / पात्र

शरत की औपन्यासिक रचना / पात्र

राजू (राजेंद्रनाथ मजूमदार)

'श्रीकांत' का इंद्रनाथ एवं 'देवदास' की रूपरेखा

सेवक मुशाई 'देवदास' का वफादार सेवक धर्मदास

पिता मोतीलाल का ससुरारी जीवन (घर-जंवाई)

'काशीनाथ' कहानी का काशीनाथ तथा 'शुभदा' का हरान बाबू

देहरी ऑन सोन (देहरी-आन-सोन) प्रवास

'गृहदाह' उपन्यास में देहरी का चित्रण

सांप पकड़ने का अनुभव व तांत्रिक मंडली

'श्रीकांत' उपन्यास एवं 'विलासी' कहानी

वेश्याओं व उपेक्षित स्त्रियों की दुर्दशा

'चरित्रहीन', 'देवदास' (चंद्रमुखी), 'श्रीकांत' (राजलक्ष्मी)

क्रांतिकारी आंदोलन व बर्मा का गुप्त जीवन

'पाथेर दाबी' का नायक सव्यसाची



7. 'आवारा मसीहा' पर प्रमुख साहित्यकारों व
 आलोचकों के कथन

UGC NET परीक्षा में 'आवारा मसीहा' से संबंधित समीक्षात्मक

 उद्धरण बार-बार पूछे जाते हैं:

डॉ. प्रभाकर माचवे:

"आधुनिक कलाकारों के लिए बर्नार्ड शा ने 'टैम्प प्रॉफेट' (आवारा-मसीहा) शब्द प्रयुक्त किया था। शरत्चंद्र पर यह विशेषण सौ प्रतिशत लागू होता है। ऐसे व्यक्ति के बारे में सामग्री खोजना अपने आप में आवारापन ओढ़े बिना संभव नहीं था। धीरे-धीरे शरत् की छाया विष्णु पर पड़ गई और इस प्रकार जीवनीकार जीवनी से एकाकार हो गया।"

इलाचंद्र जोशी:

"विष्णु शरत् साहित्य में पूरी तरह डूबने के कारण तिर गये हैं... एक उच्चकोटि के जीवनी लेखक को जिस तरह अपने प्रतिपादित विषय का निर्वाह करना चाहिये उन्होंने बिल्कुल वैसा ही किया। उनकी शैली में निहायत मासूमियत और भोलापन है।"

कमलेश्वर:

"कमलेश्वर का कहना तो यह था कि उनका सारा साहित्य एक तरफ व दूसरी तरफ मात्र एक पुस्तक 'आवारा मसीहा' असंदिग्ध रूप से रखी जा सकती है।"

गिरिराज किशोर:

"भाषा की दृष्टि से विष्णु प्रभाकर अपने आपसे निकलकर ऊपर आए हैं। इस उम्र पर पहुँचकर एक नई विधा के लिए नई भाषा को तलाश लेना अपने आप में गौरव है।"

साप्ताहिक हिंदुस्तान (पत्रिका):

"आवारा मसीहा के लेखक का हम सभी को हृदय से कृतज्ञ होना चाहिए... यह जीवनी सचमुच साहित्य का एक गौरव-ग्रंथ है। आवारा मसीहा भारतीय साहित्य में एक घटना है।"

आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय (शरत की मृत्यु पर डायरी में):

"हृन्मुच तुम्हारे समान एक लेखक की बड़ी आवश्यकता थी। सामाजिक व्याधि और दुर्नीति का चित्रण करने के लिए तुमने जिस प्रकार कलम पकड़ी, उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती।"


8. पुरस्कार, अनुवाद एवं ऐतिहासिक महत्व

पुरस्कार एवं सम्मान: 'आवारा मसीहा' के लिए विष्णु प्रभाकर जी को 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' तथा 'पाब्लो नेरुदा सम्मान' से विभूषित किया गया। (ध्यान रहे: विष्णु जी को 'अर्द्धनारीश्वर' उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था)।

विभिन्न भाषाओं में अनुवाद: यह जीवनी अंग्रेजी, बांग्ला, मलयालम,पंजाबी, सिंधी, उर्दू, तेलुगु, गुजराती और मराठी सहित अनेक भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुकी है।

ऐतिहासिक उपलब्धि: इस जीवनी ने सिद्ध कर दिया कि हिंदी गद्य में जीवनी विधा भी उपन्यास जैसी रोचकता और महाकाव्य जैसी गहराई प्राप्त कर सकती है।



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MCQ 

प्रश्न 1 (कथन और कारण - Assertion & Reason)

कथन (A): 'आवारा मसीहा' में विष्णु प्रभाकर ने शरतचन्द्र के उच्छृंखल और भटकाव भरे जीवन को चित्रित करते हुए भी उन्हें 'मसीहा' की गरिमाप्रदान की है।

कारण (R): विष्णु प्रभाकर के अनुसार आवारा और मसीहा में केवल एक ही अंतर है कि आवारा के पास दिशा नहीं होती,और जिस दिन उसे दिशा मिल जाती है, वह पीड़ित मानवता का मसीहा बन जाता है।

विकल्प: 

(A) (A) और (R) दोनों सही हैं तथा (R), (A) की 

सही व्याख्या है।

(B) (A) और (R) दोनों सही हैं किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।

(C) (A) सही है किंतु (R) गलत है।

(D) (A) गलत है किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A)

व्याख्या: जीवनी की भूमिका में विष्णु प्रभाकर स्पष्ट करते हैं कि शरत के जीवन में प्रारंभिक भटकाव अवश्य था, किंतु जब उनकी करुणा और लेखनी को समाज-कल्याण की दिशा मिली, तो वे शोषितों व नारियों के मसीहा बन गए। अतः कथन और कारण दोनों सत्य हैं तथा कारण कथन की सही व्याख्या करता है।


प्रश्न 2 (सूची-I को सूची-II से सुमेलित कीजिए)

सूची-I (आवारा मसीहा के पात्र)

सूची-II (विशेषता / औपन्यासिक आधार)

A. मुशाई। -। 'श्रीकांत' के 'इंद्रनाथ' तथा 'देवदास' पात्र का वास्तविक आधार

B. राजू (राजेंद्रनाथ) -II. 'देवदास' के 'धर्मदास' पात्र का वास्तविक आधार

C. शांति देवी-III. शरत की द्वितीय पत्नी, जो मृत्यु के बाद 22 वर्षों तक जीवित रहीं

D. हिरण्मयी देवी-IV. शरत की प्रथम पत्नी, जिनकी प्लेग बीमारी से 

मृत्यु हुई।

विकल्प (कूट): (A) A-II, B-I, C-IV, D-III

(B) A-I, B-II, C-III, D-IV

(C) A-III, B-IV, C-I, D-II

(D) A-II, B-I, C-III, D-IV

उत्तर: (A)

व्याख्या: मुशाई नाना के घर का सेवक था जो 'धर्मदास' का आधार बना; राजू शरत का साहसी मित्र था जो 'इंद्रनाथ' का आधार बना; शांति देवी पहली पत्नी थीं जिनकी प्लेग से मृत्यु हुई; और हिरण्मयी देवी दूसरी पत्नी थीं।


प्रश्न 3 (कथन I और कथन II आधारित प्रश्न)

कथन I: विष्णु प्रभाकर ने 'आवारा मसीहा' की रचना के लिए 14 वर्षों (1959 से 1973 ई.) तक कठिन शोध एवं यात्राएँ कीं।

कथन II: 'आवारा मसीहा' का प्रथम संस्करण वर्ष 1980 में प्रकाशित हुआ था।

विकल्प: (A) कथन I और कथन II दोनों सत्य हैं।

(B) कथन I और कथन II दोनों असत्य हैं।

(C) कथन I सत्य है, किंतु कथन II असत्य है।

(D) कथन I असत्य है, किंतु कथन II सत्य है।

उत्तर: (C)

व्याख्या: कथन I बिल्कुल सत्य है (14 वर्षों की शोध-साधना)।

 किंतु कथन II असत्य है क्योंकि 'आवारा मसीहा' का प्रथम संस्करण

 मार्च 1974 ई. में प्रकाशित हुआ था, न कि 1980 में।


प्रश्न 4 (बहु-विकल्पीय कूट - Multiple Correct Options)

'आवारा मसीहा' के प्रथम पर्व 'दिशाहारा' के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-कौन से कथन सही हैं?

1.इसमें शरतचन्द्र के बचपन, पारिवारिक पृष्ठभूमि और भागलपुर ननिहाल के दिनों का वर्णन है।

2.इसमें शरत के बर्मा (रंगून) प्रवास की 13 वर्षों की नौकरी का विस्तृत ब्योरा है।

3.शरत ने अपनी प्रसिद्ध कहानी 'मंदिर' सुरेंद्रनाथ गंगोपाध्याय

के छद्म नाम से 'कुंतलीन पुरस्कार' हेतु भेजी थी।

4.'दिशाहारा' पर्व का समापन शरत के रंगून प्रस्थान के साथ होता है।

विकल्प (कूट): (A) केवल 1 और 2

(B) केवल 1, 3 और 4

(C) केवल 2, 3 और 4

(D) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (B)

व्याख्या: कथन 2 असत्य है क्योंकि बर्मा (रंगून) प्रवास का वर्णन द्वितीय पर्व 'दिशा की खोज' में है, न कि प्रथम पर्व 'दिशाहारा' में। 

शेष सभी कथन (1, 3, 4) प्रथम पर्व 'दिशाहारा'से संबंधित और सत्य हैं।


प्रश्न 5 (समीक्षात्मक कथन आधारित प्रश्न)

"आधुनिक कलाकारों के लिए बर्नार्ड शा ने 'टैम्प प्रॉफेट' (आवारा-मसीहा) शब्द प्रयुक्त किया था। शरत्चंद्र पर यह विशेषण सौ प्रतिशत लागू होता है।"—'आवारा मसीहा' के संदर्भ में यह प्रसिद्ध कथन किस आलोचक का है? 

(A) डॉ. रामविलास शर्मा

(B) डॉ. प्रभाकर माचवे

(C) आचार्य रामचंद्र शुक्ल

(D) डॉ. नामवर सिंह

उत्तर: (B)

व्याख्या: यह प्रसिद्ध कथन डॉ. प्रभाकर माचवे का है, 

जिन्होंने बर्नार्ड शा के 'ट्रैम्प प्रॉफेट' शब्द से शरतचन्द्र के व्यक्तित्व की

 तुलना की थी।


प्रश्न 6 (ऐतिहासिक/प्रकाशन तथ्य आधारित प्रश्न)

सन् 1925 में महात्मा गांधी के आदेश पर शरतचन्द्र की प्रमुख रचनाओं (बिराज बहू, बिंदु की लाला, राम की सुमति, मझली दीदी) का गुजराती भाषा में अनुवाद किसने किया था? 

(A) काका कालेलकर

(B) महादेव देसाई

(C) विष्णु प्रभाकर

(D) नरहरि पारिख

उत्तर: (B)

व्याख्या: 'आवारा मसीहा' की भूमिका के अनुसार, महात्मा गांधी के निर्देश पर 1925 के आसपास महादेव देसाई ने शरत की उक्त रचनाओं का गुजराती अनुवाद किया था।


प्रश्न 7 (रचना एवं जब्ती आधारित प्रश्न)

शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की वह कौन सी प्रसिद्ध औपन्यासिक रचना थी जिसे क्रांतिकारियों के समर्थन के कारण ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबंधित एवं जब्त (Ban) कर लिया गया था? 

(A) चरित्रहीन

(B) देवदास

(C) पाथेर दाबी

(D) गृहदाह

उत्तर: (C)

व्याख्या: 'पाथेर दाबी' (1926 ई.) स्वतंत्रता सेनानियों व क्रांतिकारियों के जीवन पर आधारित उपन्यास था,

 जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने राजद्रोहात्मक मानकर जब्त कर लिया था।


प्रश्न 8 (कालक्रमानुसार/संरचनात्मक प्रश्न)

'आवारा मसीहा' जीवनी के तीनों पर्वों का सही क्रमिक संयोजन क्या है? 

(A) दिशा की खोज ➔ दिशाहारा ➔ दिशांत

(B) दिशाहारा ➔ दिशा की खोज ➔ दिशांत

(C) दिशाहारा ➔ दिशांत ➔ दिशा की खोज

(D) दिशांत ➔ दिशाहारा ➔ दिशा की खोज

उत्तर: (B)

व्याख्या: जीवनी तीन पर्वों में क्रमानुसार विभाजित है: 

1. दिशाहारा (बचपन/भटकाव), 2. दिशा की खोज (रंगून प्रवास), 

3. दिशांत (कलकत्ता वापसी व महाप्रयाण)।


प्रश्न 9 (कथन आधारित विचार)

'आवारा मसीहा' जीवनी लिखने की मूल प्रेरणा विष्णु प्रभाकर को

 मुख्य रूप से किससे प्राप्त हुई थी?

 (A) महात्मा गांधी

(B) श्री नाथूराम प्रेमी (हिंदी ग्रंथ रत्नाकर, बंबई)

(C) अज्ञेय

(D) सुमित्रानंदन पंत

उत्तर: (B)

व्याख्या: विष्णु प्रभाकर ने भूमिका व अनुशीलन में स्वीकार किया है 

कि हिंदी ग्रंथ रत्नाकर (बंबई) के अध्यक्ष श्री नाथूराम प्रेमी के आग्रह 

एवं प्रेरणा से उन्होंने शरतचन्द्र की जीवनी लिखने का 

संकल्प लिया था।




प्रश्न 10 (पुरस्कार एवं सम्मान)

विष्णु प्रभाकर को उनकी कालजयी जीवनी 'आवारा मसीहा' के लिए 

निम्नलिखित में से किस अंतरराष्ट्रीय/राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित 

किया गया था?सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार

पाब्लो नेरुदा सम्मान व्यास सम्मान

विकल्प (कूट): 

(A) केवल 1 और 2

(B) केवल 1 और 3

(C) केवल 2 और 4

(D) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (B)

व्याख्या: 'आवारा मसीहा' के लिए विष्णु प्रभाकर को

 'सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार' तथा 'पाब्लो नेरुदा सम्मान' प्राप्त हुआ था। (उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 'अर्द्धनारीश्वर' उपन्यास के लिए मिला था)।


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